भारतीय इतिहास: एक व्यापक परिचय और वैदिक संस्कृति (भाग-1)

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इतिहास: एक परिचय और वैदिक काल का विवरण 🔥

इतिहास: एक परिचय और वैदिक काल का विवरण

इतिहास (History)

  • इतिहास तीन शब्द इति + ह + आस से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है— "ऐसा निश्चित रूप से हुआ है"। खास तौर पर इतिहास में उन घटनाओं को पढ़ा जाता है जो घटित हो चुकी होती हैं। इस विषय के अंतर्गत घटित हुई घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से पढ़ा जाता है।
  • इतिहास हमें सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिवर्तन के बारे में बताता है।
  • अतीत और वर्तमान के बीच चलने वाले निरंतर संवाद को इतिहास कहते हैं।
  • ब्यूरी नामक विद्वान ने कहा है कि "इतिहास विज्ञान है, न कम न ज्यादा।
  • यूनानी विद्वान 'हेरोडोटस' को इतिहास का पिता कहा जाता है, क्योंकि इन्होंने अपनी रचना 'हिस्टोरिका' में सर्वप्रथम किसी ऐतिहासिक घटना का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने पेलोपोनेसियन के युद्ध का अपनी रचना में क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया है।

इतिहास का विभाजन

कालखंड के दृष्टिकोण से इतिहास को तीन भागों में बाँट कर पढ़ा जाता है:

  1. प्रागैतिहासिक काल (Pre-historical Age): वैसा कालखंड जिसका लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है। इसके अंतर्गत पाषाण युग को रखा जाता है।
  2. आद्य ऐतिहासिक काल (Proto-historical Age): वैसा कालखंड जिस समय का लिखित साक्ष्य उपलब्ध है लेकिन उसको पढ़ा नहीं जा सका है, उसे आद्य ऐतिहासिक काल कहते हैं। इसके अंतर्गत हड़प्पा सभ्यता को रखा जाता है।
  3. ऐतिहासिक काल (Historical Age): वैसा कालखंड जिसका लिखित साक्ष्य उपलब्ध है जिसे पढ़ा भी आसानी से जा सकता है, उसे ऐतिहासिक काल कहते हैं। भारत में 600 ईसा पूर्व से ऐतिहासिक काल की शुरुआत मानी जाती है।

भारतीय इतिहास का विभाजन

भारत इतिहास को पढ़ने में सुविधा हो, इसलिए इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है:

  1. प्राचीन भारत का इतिहास
  2. मध्यकालीन भारत का इतिहास
  3. आधुनिक भारत का इतिहास
  • ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स मिल ने धर्म या संप्रदाय के आधार पर भारतीय इतिहास को तीन भागों में बाँटा है: (1) हिंदू काल (2) मुस्लिम काल / इस्लाम काल (3) ईसाई काल / ब्रिटिश काल।
  • भारतीय इतिहास के अंतर्गत 2500 ई.पू. से 1947 ई. तक की घटनाओं को पढ़ा जाता है। जिसमें 2500 ई.पू. से 800 ई. तक की घटनाओं को प्राचीन भारतीय इतिहास के अंतर्गत पढ़ा जाता है। 800 ई. से 1707 ई. तक की घटनाओं को मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अंतर्गत पढ़ा जाता है और 1707 ई. से 1947 ई. तक की घटनाओं को आधुनिक भारतीय इतिहास के अंतर्गत पढ़ा जाता है।

ईसा पूर्व (BC) और ईस्वी (AD)

ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह हुआ करते थे ईसा मसीह के जीवन काल के पूर्व जो भी घटना घटित हुई है उसे ईसा पूर्व यानी Before Christ (BC) के अंतर्गत रखा जाता है और वैसी घटना जो ईसा मसीह के जन्म के बाद घटित हुई है उसे ई यानी Anno Domini (AD) के अंतर्गत रखा जाता है ई‌ं पूर्व में घटना है ई में बढ़ता है 

जैसे :- महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में हुआ और निधन 483 ई.पू. में हुआ। महात्मा गांधी 1869 ईस्वी में पैदा हुए और निधन 1948 ईस्वी में हुआ।

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी हमें तीन स्रोतों से प्राप्त होती है: (1) पुरातात्विक स्रोत (2) साहित्यिक स्रोत (3) विदेशी यात्रियों का विवरण।

साहित्यिक स्रोत :- 

धार्मिक साहित्य: इसके अंतर्गत वैदिक साहित्य, बौद्ध साहित्य एवं जैन साहित्य इत्यादि आते हैं। भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ 'वेद' है।

  • वेद का शाब्दिक अर्थ 'पवित्र ज्ञान' या 'जानना' होता है। इसकी कुल संख्या 4 है। वेदों को संयुक्त रूप से 'संहिता' कहते हैं।वेद चार हैं: (1) ऋग्वेद (2) यजुर्वेद (3) सामवेद (4) अथर्ववेद।

(1) ऋग्वेद:

  • यह सबसे प्राचीन वेद है। इसकी रचना 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच में हुई है। इसकी रचना सत्त सेंधव क्षेत्र में हुई है 
  • 2026 लेटेस्ट अपडेट (ASI Rajasthan Dig): नई खुदाई में 3500 BCE settlements मिले Saraswati paleochannel के पास, Rigveda-era link confirm – Times of India, June 2025. 🔥
  • यूनेस्को (UNESCO) ने ऋग्वेद को विश्व मानव धरोहर साहित्य में शामिल किया है। (Confirm: Memory of the World Register, 2007 – Bhandarkar Institute manuscripts)
  • ऋग्वेद का सबसे प्राचीन मंडल 2 से 7 मंडल है। इन मंडलों की रचना एक ही गोत्र के ऋषि-मुनियों ने किया है, जिस कारण इसे 'वंश मंडल' या 'गोत्र मंडल' भी कहा जाता है।
  • ऋग्वेद का सबसे नया मंडल 1 और 10 है, जो सबसे बाद में जोड़ा गया है।
  • ऋग्वेद के पाठ करने वाले को 'होतृ' कहा जाता है।
  • ऋग्वेद के 10वें मंडल में कहा गया है कि परम पिता ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति हुई है, भुजा से क्षत्रिय की, जंघा से वैश्य की और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई है।
  • क्षत्रिय का कार्य शासन प्रशासन को देखना होता है 
  • ब्राह्मण का कार्य अध्ययन अध्यापक करना और पूजा पाठ करना होता है
  • वैश्य का कार्य कृषि और पशुपालन करना होता है 
  • शूद्र का आकार तीनों वर्णों का सेवा करना होता है 
  • चार वर्ण व्यवस्था का सूत्रपात ऋग्वेद के दसवें मंडल में हुआ माना जाता है 
  • शूद्र शब्द का प्रयोग प्रथम बार ऋग्वेद के 10 में मंडल में ही देखने को मिलता है 
  • गायत्री मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद के तीसरे मंडल में है। इस मंत्र की रचना विश्वामित्र ने किया है। यह मंत्र सूर्य देवता 'सावित्री' को समर्पित है।
  • कृषि संबंधित जानकारी ऋग्वेद के 4 और 10 मंडल में मिलती है।
  • ऋग्वेद में सिर्फ एक फसल यव ( जौ)  का उल्लेख देखने को मिलता है अन्य वेदों में अलग-अलग फसलों का उल्लेख हैं 
  • तीन पागो में संसार को मापने वाले भगवान विष्णु का उल्लेख है ऋग्वेद के पहले सातवें और आठवें मंडल में देखने को मिलता है 
  • ऋग्वेद के 8वें मंडल के हस्तलिखित ऋचाओं को 'खिल' कहा जाता है।
  • ऋग्वेद के 9वें मंडल में हमें वनस्पति के देवता अर्थात सोम देवता को लेकर जानकारी प्रदान करता है 

(2) यजुर्वेद:

  • यजु शब्द और वेद से मिलकर यजुर्वेद बना है, जिसमें यजु का अर्थ 'यज्ञ' और वेद का अर्थ 'जानना' होता है।
  • यह वेद हमें यज्ञ के समय होने वाले विधि-विधानों को लेकर जानकारी देता है, जिस कारण इसे 'कर्मकांडीय वेद' भी कहा जाता है।
  • वेद सामान्यतः पद्य में लिखा गया है, लेकिन यजुर्वेद एक ऐसा वेद है जो गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है।
  • यजुर्वेद को दो भाग 'शुक्ल यजुर्वेद' और 'कृष्ण यजुर्वेद' में बाँटकर पढ़ा जाता है। इसमें कृष्ण यजुर्वेद ही गद्य और पद दोनों में लिखा गया है
  • यजुर्वेद के पाठकर्ता को 'अध्वर्यु' कहते हैं।
  • यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद की रचना 1000 ईसा पर्व  से 600 ईसा पूर्व के बीच में गंगा जमुना दोआब क्षेत्र में हुआ है 

(3) सामवेद:- 

  • सम का अर्थ गाना होता है भारतीय संगीत के साथ मूल स्वर्ग सा, रे, गा, मा, पा, धा ,नि की उत्पत्ति सामवेद से हुई है इसी कारण सामवेद को भारतीय संगीत का जनक माना जाता है 
  • इसके पाठकर्ता को 'उद्गातृ' कहते हैं।
  • सामवेद के अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से लिया गया है जिसके कारण इसे ऋग्वेद पर आधारित वेद माना जाता है 

(4) अथर्ववेद :- 

  • यह सबसे बाद का भेद है यानी यह सबसे आधुनिक वेद है इस वेद में 20 अध्याय 731 सुत 6000 मंत्र हैं इस वेद की रचना अथर्वा ऋषि ऋषि ने किए हैं इस वेद में आर्य और अनार्य दोनों की चर्चा है  इसी कारण इसे पवित्र वेद नहीं माना जाता है इस वेद में रोग निवारण, तंत्र मंत्र , जादू टोना , औषधि इत्यादि का उल्लेख है 
  • इस वेद में सभा और समिति को प्रजापति के दो पुत्र कहा गया है 
  • वेदों के समझाने के लिए ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई है 
  • अलग-अलग वेदों के ऊपर अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई है 
वेदों का तुलनात्मक चार्ट

वेदों का तुलनात्मक अध्ययन : पाठकर्ता, मुख्य विशेषताएँ एवं ब्राह्मण ग्रंथ

वेद पाठकर्ता मुख्य विशेषताएँ ब्राह्मण ग्रंथ
ऋग्वेद होतृ
  • सबसे प्राचीन वेद
  • गायत्री मंत्र (तीसरा मंडल)
  • 10 मंडल
  • ऐतरेय
  • कौषीतकी
यजुर्वेद अध्वर्यु
  • यज्ञ विधि-विधान
  • गद्य और पद्य दोनों में लिखित
  • शतपथ
  • तैत्तिरीय
सामवेद उद्गातृ
  • भारतीय संगीत का जनक
  • पंचविंश
  • षड्विंश
अथर्ववेद ब्रह्मा
  • जादू-टोना
  • औषधि
  • रोग निवारण
  • गोपथ

वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य

  • अथर्ववेद के पाठ करने वाले को 'ब्रह्मा' कहते हैं।
  • वेदत्रयी: इसका शाब्दिक अर्थ 'तीन पवित्र वेद' होता है। इसके अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आते हैं। (अथर्ववेद इसमें शामिल नहीं है) 

आरण्यक :- 

वेदों को समझने के लिए जंगल के  में जो साहित्य लिखा गया है, उसे 'आरण्यक' साहित्य कहते हैं। ध्यान रहे कि अथर्ववेद को छोड़कर अन्य तीनों वेदों पर आरण्यक साहित्य की रचना हुई है।

उपनिषद :- 

  • 'उप + निषद् से मिलकर उपनिषद् शब्द बना है जिसमें  उप का अर्थ निकट और निषद् का अर्थ ज्ञान प्राप्त करना होता है
  • उपनिषदों की कुल संख्या 108 है।

जाबालोपनिषद: यह उपनिषद हमें चार आश्रमों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

चार आश्रम (जाबालोपनिषद के अनुसार): 

  1. ब्रह्मचर्य आश्रम: जन्म से 25 वर्ष की आयु को ब्रह्मचर्य आश्रम के अंतर्गत रखा जाता है इस समय मानव का काम ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अध्ययन करना होता था।
  2. गृहस्थ आश्रम: 25 से 50 वर्ष के उम्र को गृहस्थ आश्रम के अंतर्गत रखा जाता था। इस समय मानव का काम शादी-विवाह कर संतान की उत्पत्ति करना होता था।
  3. वानप्रस्थ आश्रम: इस समय मानव का काम घर में मालिक की भाँति परिवार को संभालना होता था। 50-75 वर्ष की आयु को वानप्रस्थ आश्रम के अंतर्गत रखा जाता है।
  4. संन्यासी आश्रम: 75 से 100 वर्ष की आयु को संन्यासी आश्रम के अंतर्गत रखा जाता है। इस समय मानव का काम घर-परिवार छोड़कर मोह-माया से दूर होकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना होता था।
  5. हिंदू धर्म में चार आश्रम : आयु एवं मुख्य उद्देश्य

    हिंदू धर्म में चार आश्रम : आयु एवं मुख्य उद्देश्य

    आयु वर्ग आश्रम मुख्य उद्देश्य
    0 - 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम शिक्षा और अनुशासन
    25 - 50 वर्ष गृहस्थ आश्रम पारिवारिक जीवन और ऋणों से मुक्ति
    50 - 75 वर्ष वानप्रस्थ आश्रम सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक चिंतन
    75 - 100 वर्ष संन्यास आश्रम मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वर भक्ति
  • मुण्डकोपनिषद: यहाँ से सत्यमेव जयते शब्द लिया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है सदा सत्य की जीत होती है। भारत का आदर्श राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते है।
  • कठोपनिषद: इसमें यम-नचिकेता संवाद का उल्लेख है।
  • श्वेताश्वतरोपनिषद: इसमें सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् का जिक्र देखने को मिलता है जिसका अर्थ है सत्य ही शिव है और शिव ही सुन्दर यानी सत्य ही ईश्वर है।

महाकाव्य :- 

इसकी कुल संख्या दो है।

  1. रामायण
  2. महाभारत

(1) रामायण:

इसे आदिकाव्य की संज्ञा दी जाती है। इसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इसमें प्रारम्भ में श्लोकों की संख्या 6000 हुआ करता था। आगे चलकर श्लोकों की संख्या बढ़कर 12,000 हो गई और वर्तमान में 24,000 है।

  • इसे 7 कांडों में बांटा गया है: (1) बालकांड (2) अयोध्याकांड (3) अरण्यकांड (4) किष्किन्धाकांड (5) सुंदरकांड (6) युद्धकांड (7) उत्तरकांड।
  • भगवान विष्णु के 7वें अवतार में राम-जन्म त्रेता युग में अयोध्या में 'सरयू नदी' तट पर हुआ है।
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    भारतीय इतिहास: एक व्यापक परिचय और वैदिक संस्कृति (भाग-1)

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