वैदिक सभ्यता
हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद जिस सभ्यता का उदय हुआ उसे वैदिक सभ्यता कहते हैं। इस सभ्यता का निर्माता आर्य लोगों को माना जाता है। आर्यों के बारे में यह कहा जाता है कि वे पशुचारक थे तथा वे चारागाह की खोज में भारत आए थे।
- आर्यों द्वारा विकसित वैदिक सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी।
- आर्यों की भाषा संस्कृत थी।
- 'आर्य' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम प्रो. मैक्समूलर (1853) ने एक श्रेष्ठ जाति के रूप में किया। यानी आर्य का शाब्दिक अर्थ 'एक श्रेष्ठ जाति' होता है।
आर्य कहाँ के रहने वाले थे, इसको लेकर विद्वानों के बीच मतभेद रहा है। जिसमें प्रो. मैक्समूलर का यह मानना था कि आर्य मध्य एशिया के रहने वाले थे। इस बात से अधिकतर विद्वान सहमत हैं।
- बाल गंगाधर तिलक ने 'द आर्कटिक होम इन द वेदाज़' सिद्धांत दिया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि आर्य आर्कटिक क्षेत्र (अर्थात उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र) के रहने वाले थे।
- स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यों का निवास स्थल तिब्बत को बताया।
- पेन्का नामक विद्वान के अनुसार आर्य जर्मनी के रहने वाले थे।
- गाइल्स नामक विद्वान के अनुसार आर्य हंगरी के रहने वाले थे।
- अविनाश चन्द्र दास के अनुसार आर्य सप्त सैंधव क्षेत्र के रहने वाले थे।
- ऋग्वेद के अनुसार भी आर्य सप्त सैंधव क्षेत्र के रहने वाले थे।
सप्त सैंधव का अर्थ सात नदियों की भूमि होता है, जिसमें सिन्धु नदी, झेलम नदी, चिनाब नदी, रावी नदी, व्यास नदी, सतलुज नदी और सरस्वती नदी इत्यादि आती हैं।
वैदिक सभ्यता सिन्धु नदी से लेकर गंगा-यमुना दोआब तक फैली हुई थी, जिसे 'ब्रह्मवर्त' देश कहा गया है।
वैदिक सभ्यता का सर्वमान्य काल 1500 ई. पूर्व से 600 ई. पूर्व माना जाता है। इस कालखंड को दो भागों में बाँट कर पढ़ा जाता है:
- ऋग्वैदिक काल या पूर्व वैदिक काल
- उत्तर वैदिक काल
1500 ई. पूर्व से 1000 ई. पूर्व के कालखंड को ऋग्वैदिक काल कहा जाता है क्योंकि इस दौरान ऋग्वेद की रचना हुई है और इस कालखंड की जानकारी हमें ऋग्वेद ही देता है।
1000 ई. पूर्व से 600 ई. पूर्व के कालखंड को उत्तर वैदिक काल कहते हैं। इस दौरान यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक साहित्य और उपनिषद की रचना हुई है। यही वैदिक साहित्य उत्तर वैदिक काल के बारे में जानकारी देता है।
वैदिक सभ्यता के बारे में जानकारी हमें वैदिक साहित्य से मिलती है। वैदिक साहित्य के अंतर्गत वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद आते हैं।
इन वैदिक साहित्यों में सबसे पहले वेद की रचना हुई है तथा वेद को ही समझने के लिए ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद की रचना हुई है।
ऋग्वैदिक काल (1500 ई. पूर्व - 1000 ई. पूर्व)
ऋग्वैदिक काल के जीवन को चार मुख्य आधारों पर समझा जाता है:
- 1• सामाजिक जीवन
- 2• आर्थिक जीवन
- 3• राजनीतिक जीवन
- 4• धार्मिक जीवन
महत्वपूर्ण तथ्य
- ऋग्वैदिक काल के बारे में जानकारी हमें ऋग्वेद देता है।
- UNESCO ने ऋग्वेद को विश्व मानव धरोहर साहित्य में शामिल किया है।
- ऋग्वेद की कुछ बातें ईरान के मूल ग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' से मिलती-जुलती हैं, जिस कारण इतिहासकारों का मानना है कि आर्य ईरान होते हुए भारत आए थे।
- ऋग्वेद में कुल 25 नदियों का उल्लेख है, जिसमें सर्वाधिक बार वर्णित नदी सिन्धु नदी है।
- ऋग्वेद के अनुसार सबसे पवित्र नदी सरस्वती को बताया गया है। सरस्वती नदी के लिए ऋग्वेद में नदीतमा, देवीतमा, मातेतमा शब्दों का प्रयोग किया गया है।
- ऋग्वेद में गंगा नदी की चर्चा एक बार और यमुना नदी की चर्चा तीन बार की गई है।
- ऋग्वेद में हिमालय पर्वत की एक चोटी मुजवंत का उल्लेख देखने को मिलता है।
| क्रम | प्राचीन नाम | आधुनिक नाम |
|---|---|---|
| 1 | परुष्णी | रावी |
| 2 | अस्किनी | चिनाब |
| 3 | शतद्रु | सतलज |
| 4 | विपाशा | व्यास |
| 5 | वितस्ता | झेलम |
| 6 | कुभा | काबुल |
| 7 | क्रुमु | कुर्रम |
| 8 | सिन्धु | इण्डस |
| 9 | सदानीरा | गंडक |
| 10 | गोमल | गोमती |
सामाजिक जीवन
- ऋग्वैदिक कालीन समाज पितृसत्तात्मक (पुरुष प्रधान) था, लेकिन फिर भी महिलाओं की स्थिति काफी अच्छी थी।
- समाज की आधारभूत इकाई 'कुल' या परिवार थी, जिसका मुखिया पिता होता था जिसे 'कुलप' कहा जाता था।
- ऋग्वैदिक काल में संयुक्त परिवार का प्रचलन था, जिसमें परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते थे। दादा, दादी, नाना, नानी, चाचा, चाची इत्यादि के लिए 'नप्तृ' शब्द का प्रयोग किया जाता था।
- इस काल में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन हो चला था। वर्ण का निर्धारण कर्म के आधार पर होता था। समाज में चार वर्ण थे: (1) ब्राह्मण, (2) क्षत्रिय, (3) वैश्य, (4) शूद्र।
- अध्ययन-अध्यापन करने वाले ब्राह्मण, शासन-प्रशासन करने वाले क्षत्रिय, कृषि-पशुपालन करने वाले वैश्य और ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करने वाले शूद्र कहलाए।
महिलाओं की स्थिति
- इस समय महिलाएँ शिक्षा ग्रहण कर सकती थीं। इस काल में कई विदुषी महिलाएँ जैसे घोषा, सिकता, अपाला, लोपामुद्रा इत्यादि की चर्चा मिलती है।
- महिलाओं का शोषण करने वाली प्रथाएँ (जैसे- बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा) प्रचलन में नहीं थीं।
- ऋग्वैदिक काल में विधवा पुनर्विवाह प्रथा और नियोग प्रथा का प्रचलन था।
- महिलाएँ अपने पति के साथ यज्ञ कार्यों में भाग ले सकती थीं।
- महिलाओं को उपनयन संस्कार करने का अधिकार प्राप्त था।
धार्मिक मान्यताएँ: तीन ऋण
हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार तीन प्रकार के ऋण होते हैं:
- पितृ ऋण: विवाह करके संतान की उत्पत्ति करने पर व्यक्ति इस ऋण से मुक्त होता है।
- ऋषि ऋण: अपनी संतान को पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।
- देव ऋण: बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान (यज्ञ) कराकर इस ऋण से मुक्त हुआ जाता है।
विवाह के प्रकार
ऋग्वैदिक काल में विवाह दो प्रकार के होते थे:
- अनुलोम विवाह: जब उच्च वर्ण के पुरुष का विवाह निम्न वर्ण की महिला के साथ होता था।
- प्रतिलोम विवाह: जब उच्च वर्ण की महिला का विवाह निम्न वर्ण के पुरुष के साथ होता था।
ऋग्वैदिक काल में लोग शाकाहारी और माँसाहारी दोनों प्रकार के भोजन करते थे। इस समय सोम और सुरा का प्रचलन था, ये दोनों पेय पदार्थ थे।
इस समय लोग सूती, ऊनी और चमड़े के वस्त्र पहनते थे। इस काल में नर्तकी के द्वारा विशेष प्रकार का वस्त्र पहना जाता था जिसे पेशस कहा जाता था।
ऋग्वेद में वैद्य के लिए 'भिषज' शब्द का प्रयोग किया गया है।
इस काल में मृत्यु के बाद सामान्य तौर पर लोगों को जलाया जाता था, लेकिन कभी-कभी दफनाने का कार्य भी किया जाता था।
धार्मिक जीवन
- ऋग्वेद के अनुसार ऋग्वैदिक कालीन लोग बहुदेववादी थे। ऋग्वेद में कई देवताओं जैसे: इन्द्र, अग्नि, वरुण, द्यौस इत्यादि की चर्चा मिलती है।
- ऋग्वेद में सबसे अधिक बार इन्द्र की चर्चा है (250 बार)। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि ऋग्वैदिक कालीन सबसे लोकप्रिय देवता इन्द्र थे। इन्द्र को रथ्येष्ठ, पुरंदर, मधवा, सोमपाल इत्यादि शब्दों से संबोधित किया गया है।
- दूसरे सबसे लोकप्रिय देवता अग्नि थे, जिनकी चर्चा ऋग्वेद में 200 बार की गई है। अग्नि देवता मानव और ईश्वर के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं। ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्नि देवता को समर्पित है।
- तीसरे सबसे लोकप्रिय देवता वरुण थे, जिनकी चर्चा 33 बार हुई है। वरुण के लिए ऋग्वेद में 'ऋतस्य गोपा' शब्द आया है।
- ऋग्वैदिक कालीन सबसे प्राचीनतम देवता द्यौस थे, जो कि आकाश के देवता थे।
- ऋग्वैदिक काल में सरस्वती नदी की देवी थीं, लेकिन बाद में जाकर यह विद्या की देवी हो गईं।
अन्य देवियाँ:
- इला: संकट हरने वाली देवी
- उषा: प्रातः काल की देवी
- अरण्यानी: जंगल की देवी
- अदिति: सभी देवियों की माता
आर्थिक जीवन
- इस काल में लोगों का मुख्य पेशा पशुपालन था तथा द्वितीयक पेशा कृषि था।
- ऋग्वैदिक आर्यों के लिए सबसे पवित्र पशु गाय थी। गाय के लिए अघन्या, अष्टकर्णी, शतदाय इत्यादि शब्द आए हैं। 'अघन्या' का शाब्दिक अर्थ 'न मारे जाने योग्य पशु' होता है।
- ऋग्वैदिक काल में गाय की हत्या करने पर व्यक्ति को मृत्युदंड या देश निकाला दिया जाता था।
- इस काल में 'गौ धन' सबसे प्रमुख संपत्ति थी। सबसे ज्यादा लड़ाइयाँ गाय को लेकर ही होती थीं।
दशराज्ञ युद्ध: यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर भरत कबीला (सुदास) और दस राजाओं के संगठन के बीच हुआ था। इसमें सुदास की जीत हुई, जिस कारण हमारे देश का नाम भारत पड़ा। इसका उल्लेख ऋग्वेद के 7वें मंडल में है।
- आर्यों का अति उपयोगी पशु घोड़ा था।
- ऋग्वेद के 4थे मंडल में कृषि की चर्चा है। जौ के लिए 'यव' और चावल के लिए 'व्रीहि' शब्द का प्रयोग किया गया है। कपास का उल्लेख ऋग्वेद में नहीं है।
- पुत्री को 'दुहिता' कहा जाता था क्योंकि वही गाय का दूध दुहती थी।
- व्यापार वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) पर आधारित था। गाय की चोरी के लिए 'पणि' नामक व्यापारी प्रसिद्ध थे। सूदखोर को 'वेकनाट' कहा जाता था।
राजनीतिक जीवन
- इस काल में राजतंत्रात्मक शासन प्रणाली की शुरुआत हो चुकी थी।
- इस काल में कबीलाई व्यवस्था का प्रचलन था। प्रत्येक कबीला का एक राजा होता था, जिसे 'गोप' कहा जाता था।
- आर्यों को 'पंचजन' भी कहा गया है। क्योंकि आर्य पाँच कबीलों में बँटे थे: (1) अनु, (2) द्रुह्यु, (3) पुरु, (4) तुर्वस, (5) यदु
- ऋग्वैदिक काल में राजा के पास स्थायी सेना नहीं थी। लेकिन जरूरत पड़ने पर राजा अपने नागरिकों की मदद से एक सेना का गठन कर लेता था, जिसे 'नागरिक सेना' कहा गया है।
- इस समय 'बलि' नामक कर (Tax) का प्रचलन हो चला था, जो एक स्वेच्छाचारी कर था। यानी यह कर देना अनिवार्य नहीं था।
- इस समय 'सभा' और 'समिति' नामक संगठन राजा को सलाह एवं सहयोग देता था। सभा, संभ्रांत (बुजुर्ग) लोगों का संगठन हुआ करता था। यही समिति आमजनों का संगठन हुआ करता था। 'विदथ' भी आमजनों का ही संगठन था। संभवतः सभी राजनीतिक संगठनों में सबसे प्राचीनतम संगठन विदथ ही था।
- इस काल में महिला सक्रिय तौर पर भाग लेती थीं।
- इस काल में भूमि का स्वामी राजा नहीं होता था, बल्कि भूमि का स्वामी जनता के पास ही होता था।
इस समय कई कुल को मिलकर एक 'ग्राम' बनता था। ग्राम के प्रशासक को 'ग्रामणी' कहा जाता था। कई ग्राम को मिलकर 'विश' बनता था। विश के प्रशासक को 'विशपति' कहा जाता था। कई विश मिलकर 'जन' बनता था और कई जन मिलकर 'राष्ट्र' बनता था।
निष्कर्ष :-
- मजबूत नींव: वैदिक सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं की एक ऐसी ठोस नींव रखी, जिसका प्रभाव आज भी हमारे जीवन में दिखता है।
- आदर्श समाज: इस काल में समाज कर्म पर आधारित था, जहाँ महिलाओं को सम्मान और बराबरी के अधिकार प्राप्त थे।
- प्राकृतिक जुड़ाव: लोगों का जीवन सादगीपूर्ण था और वे नदियों एवं प्रकृति की शक्तियों को ईश्वर मानकर उनकी पूजा करते थे।
- आर्थिक आधार: पशुपालन और कृषि ने इस सभ्यता को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया, जिसमें गाय समृद्धि का मुख्य प्रतीक थी।
- लोकतांत्रिक शासन: 'सभा' और 'समिति' जैसी संस्थाओं ने प्राचीन भारत में लोकतंत्र और निष्पक्ष न्याय की शुरुआत की।
- ज्ञान का भंडार: वेदों की रचना ने भारत को आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से 'विश्व गुरु' के रूप में स्थापित किया।
- अमूल्य विरासत: संक्षेप में, ऋग्वैदिक काल नैतिकता, अनुशासन और ज्ञान का एक ऐसा संगम था जिसने भारतीय गौरव को नई ऊंचाइयां दीं।
