हड़प्पा सभ्यता: सम्पूर्ण अध्ययन | इतिहास, नगर नियोजन, लिपि, पतन , MCQ, notes

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सिन्धु घाटी सभ्यता (हड़प्पा)

हड़प्पा सभ्यता: सम्पूर्ण अध्ययन | इतिहास, नगर नियोजन, लिपि, पतन , MCQ, notes


भारत की पहली सभ्यता हड़प्पा सभ्यता है। इसका विकास सिन्धु और इसकी सहायक नदियों के आस-पास हुआ है। इसका विकास भारत के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ है। यह सभ्यता भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान देशों में फैली है।

हड़प्पा की समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता है। विश्व की पहली सभ्यता मेसोपोटामिया की सभ्यता है जिसे 'सुमेरियन' सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। यह सभ्यता इराक में दजला और फरात नदी के तट पर फली-फूली थी।

विश्व की दूसरी सभ्यता मिस्र की सभ्यता है जो नील नदी के तट पर फली-फूली थी।

नील नदी को मिस्र की सभ्यता की देन कहा जाता है। हड़प्पा सभ्यता के बारे में जानकारी हमें पुरातात्विक स्रोत से प्राप्त होती है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हड़प्पा सभ्यता को आद्य-ऐतिहासिक काल के अंतर्गत रखा जाता है क्योंकि इस कालखण्ड का लिखित साक्ष्य उपलब्ध है, लेकिन उसे पढ़ा नहीं जा सका है। तमिलनाडु की राज्य सरकार ने यह घोषणा किया है कि जो भी हड़प्पा लिपि पढ़ेगा उसे इनाम के तौर पर प्रोत्साहन राशि दिया जाएगा।

धात्विक दृष्टिकोण से हड़प्पा सभ्यता को कांस्ययुगीन सभ्यता के अंतर्गत रखा जाता है क्योंकि हड़प्पा स्थल के उत्खनन में भारी मात्रा में कांसा धातु की प्राप्ति हुई है। कांसा धातु का निर्माण तांबा और टिन को मिलकर बनाया जाता है।

मानव ने सर्वप्रथम 5000 ई० पूर्व में तांबा धातु का प्रयोग किया है।

भारत में सभ्यता और संस्कृति का विकास क्रम निम्न है:- ताम्रयुगीन, कांस्ययुगीन (हड़प्पा सभ्यता), लौह युगीन सभ्यता संस्कृति (वैदिक सभ्यता)।

हड़प्पा सभ्यता विस्तार भारत के निम्न राज्य जैसे:- जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र में देखने को मिलता है।

हड़प्पा सभ्यता लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, इसकी आकृति त्रिभुजाकार है।

चौहद्दी

हड़प्पा सभ्यता उत्तर में मांडा तक फैला है, जो जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी के तट पर स्थित है। यह सभ्यता दक्षिण में दायमाबाद तक फैली हुई है, यह महाराष्ट्र में स्थित है इसका संबंध गोदावरी या प्रवरा नदी से है। यह सभ्यता पूरब में आलमगीरपुर तक फैली हुई है, आलमगीरपुर उत्तर-प्रदेश में हिंडन नदी के तट पर है। यह सभ्यता पश्चिम में पाकिस्तान के सुत्कागेंडोर तक फैली हुई है, यह बलूचिस्तान प्रांत के अंतर्गत दाश्क नदी के तट पर स्थित है।

हड़प्पा सभ्यता की खोज वर्ष 1921 में सर जॉन मार्शल के दिशा-निर्देशन में दयाराम साहनी ने किया है। इस सभ्यता के अंतर्गत सबसे पहले हड़प्पा नामक स्थल की खोज की गई है, इसीलिए हड़प्पा को मुख्य स्थल माना जाता है।

भारत में खोजा गया सबसे पहला और पुराना शहर हड़प्पा है।

हड़प्पा स्थल के उत्खनन से यह पता चलता है कि सबसे समृद्ध और विकसित बड़ा स्थल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो है। जिस कारण पिग्गट नामक विद्वान ने विस्तृत हड़प्पा साम्राज्य की जुड़वां राजधानी की संज्ञा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को दिया है।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बीच की दूरी 483 किमी है। यह दो शहर आपस में एक-दूसरे से सिन्धु द्वारा जुड़ा हुआ है।

सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल मोहनजोदड़ो है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के तट पर स्थित है।

भारत में स्थित सभी हड़प्पाई स्थलों में सबसे बड़ा राखीगढ़ी है जो कि हरियाणा में घग्घर नदी के तट पर स्थित है।

हड़प्पा सभ्यता की खोज सर्वप्रथम 1826 में चार्ल्स मैसन के द्वारा किया गया है।

हड़प्पा एक शहरी और नगरीय सभ्यता थी। इस सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय व्यापार हुआ करता था। इस काल में शासन वणिक यानी व्यापारी वर्ग के हाथों में हुआ करता था। इस काल में कोई भी वर्ण व्यवस्था का प्रचलन देखना को नहीं मिलता है।

हड़प्पा सभ्यता की विशेषता

इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसका नगर नियोजन प्रणाली और उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली थी।

हड़प्पा काल में सड़क किनारे भवन या मकान होते थे। मकान पक्की ईंट का बनाया जाता था। मकान ग्रिड पद्धति या जाल पद्धति के तहत बनाया जाता था।

हड़प्पा काल में सड़क कच्ची ईंट या मिट्टी से बनाया जाता था। सड़क एक-दूसरे को समकोण पर काटता था।

हड़प्पा काल में नगर को दो भागों में बांटा गया था। पूर्वी और पश्चिमी भाग, पश्चिमी भाग थोड़ा ऊँचा होता था क्योंकि वहाँ शासक वर्ग के लोग रहा करते थे। पूर्वी भाग आम जनता निवास करता था।

नोट: गुजरात में स्थित धौलावीरा एक ऐसा हड़प्पाई स्थल है जहाँ त्रि-स्तरीय नगर के प्रमाण मिले हैं।

हड़प्पा काल में पूर्वी भाग और पश्चिमी भाग का अलग-अलग किलेबंदी किया जाता था। लेकिन अपवाद स्वरूप कालीबंगा एक ऐसा हड़प्पाई स्थल है जहाँ पूर्वी और पश्चिमी भाग का किलेबंदी एक साथ किया गया है।

हड़प्पा काल में भवन के दरवाजा और खिड़कियां मुख्य सड़क की ओर न खुलकर पीछे की ओर या गली में खुला करता था। ऐसा सुरक्षा और स्वच्छता को ध्यान में रखने हेतु किया जाता था। लेकिन अपवाद स्वरूप लोथल नगर के द्वार के दरवाजे मुख्य शहर की ओर खुला करता था।

हड़प्पा काल में प्रत्येक आंगन में एक कुआँ होता था। जल निकासी को लेकर घर के नालों को मुख्य नाले से जोड़ा जाता था। मुख्य नाला शहर किनारे किनारे होता था नाला ढका होता था जिसमें जगह-जगह चैम्बर लगी होता था।

नोट: सबसे उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली का पता धौलावीरा से चलता है।

हड़प्पा सभ्यता का निर्माता

हड़प्पाई स्थलों के उत्खनन से भारी मात्रा में मानव कंकाल की प्राप्ति हुई है जिसका अध्ययन से यह पता चला है कि हड़प्पा काल में चार प्रजाति के लोग निवास करते थे: (1) भूमध्यसागरीय (2) अल्पाइन (3) मंगोलायड (4) प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड।

सबसे ज्यादा भूमध्यसागरीय प्रजाति के लोग निवास करते थे, जिस कारण इसे हड़प्पा सभ्यता का निर्माता माना जाता है।

सबसे अधिक मानव कंकाल की प्राप्ति मोहनजोदड़ो से हुई है, मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ 'मृतकों का टीला' होता है।

नामकरण

हड़प्पा सभ्यता सबसे उपयुक्त नाम हड़प्पा सभ्यता ही है क्योंकि इस सभ्यता के अंतर्गत सबसे पहले हड़प्पा नामक स्थल की खोज हुई है। इसे सिन्धु सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह सभ्यता सिन्धु नदी और इसके आस-पास नदियों के बीच फली-फूली है।

हड़प्पा सभ्यता के लोगों के लिए सबसे पवित्र या आदरणीय नदी सिन्धु नदी है। सबसे आदरणीय देवता आद्य शिव, सबसे आदरणीय पशु एक श्रृंगी बैल, सबसे आदरणीय पक्षी फाख्ता, सबसे आदरणीय वृक्ष पीपल हुआ करता था।

काल निर्धारण

हड़प्पा सभ्यता के कालखंड को लेकर विद्वानों के बीच विवाद है लेकिन इस सभ्यता का सर्वाधिक मान्य कालखंड 2500 ई० पूर्व से 1800 ई० पूर्व माना जाता है।

कार्बन डेटिंग पद्धति C-14 के तहत इस सभ्यता का कालखंड 2350 ई० पूर्व से 1750 ई० पूर्व माना जाता है।

जॉन मार्शल विद्वान के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक मान्य कालखंड 3250 ई० पूर्व से 2750 ई० पूर्व माना जाता है।

अर्नेस्ट मैके के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का सामान्य काल 3000 ई० पूर्व से 2500 ई० पूर्व माना गया है।

व्हीलर नामक विद्वान के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का काल खंड 2500 ई० पूर्व से 1700 ई० पूर्व माना गया है।

मुख्य हड़प्पाई स्थल

1. हड़प्पा:
यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिला में स्थित है। इसकी खोज 1921 ई० में दयाराम साहनी ने किया था। यहाँ से RH-37 कब्रिस्तान, शवधान पेटिका, गेहूँ, जौ, स्त्री के गर्भ से निकलता हुआ पौधा, ताँबे का पैमाना, चक्र का साक्ष्य, स्वास्तिक चिह्न, अन्नागार, हवन, शंख का बना बैल इत्यादि मिले हैं। हड़प्पा रावी नदी के किनारे है।

2. मोहनजोदड़ो:
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ मृतकों का टीला होता है। यह नगर पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत के लरकाना जिला में सिन्धु नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज 1922 ई० में राखालदास बनर्जी ने किया है। यहाँ से एक शील (पत्थर) प्राप्त हुआ है।

यहाँ से ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए योगी की प्रतिमा, सबसे विशाल स्नानागार, सबसे विशाल अन्नागार, काँसे की नर्तकी की मूर्ति, सूती कपड़ा, हाथी का कपाल खंड, घोड़े के दाँत, मिट्टी के तराजू, सबसे बड़ी ईंट इत्यादि के प्रमाण मिले हैं।

एक शील पर ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए योगी की प्रतिमा के आगे और पीछे कुछ जानवर हैं जैसे:- गेंडा, बाघ, हिरण, भैंसा, हाथी।

3. चन्हुदड़ो:
यह पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में सिन्धु नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज अर्नेस्ट मैके के निर्देशन में गोपाल मजुमदार ने किया है। यहाँ से अलंकृत हाथी, वक्राकार ईंट, कंघा, लिपस्टिक, मनके बनाने के कारखाने, मेकअप का सामान, चार पहियों वाली गाड़ी, गुड़िया, सीसा, बिल्ली के पीछा करते हुए हाथी इत्यादि मिले हैं।

4. लोथल:
यह भारत के गुजरात प्रांत में भोगवा नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज रंगनाथ राव ने की है। यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा बंदरगाह नगर था। यहाँ से फारस की मुहर, दिशा सूचक यंत्र, ताँबे का कुत्ता, चावल और बाजरा का साक्ष्य, तीन युग्मित समाधियाँ, धान की भूसी इत्यादि मिले हैं।

5. कालीबंगा:
इसका शाब्दिक अर्थ 'काले रंग की चूड़ियाँ' होता है। यह भारत के राजस्थान प्रांत में घग्घर नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज अमलानंद घोष, बी.बी. लाल, बी.के. थापर के द्वारा किया गया है। यहाँ से अग्निकुंड, जूते हुए खेत, एक साथ दो फसल उगाने का प्रमाण, भूकंप इत्यादि के साक्ष्य मिले हैं।

मिट्टी का खिलौना, बेलनाकार मुहर, प्रतीकात्मक समाधियाँ मिले हैं, यह घग्घर नदी के तट पर स्थित है।

6. बनवाली:
यह हरियाणा में रंगोई नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज रवीन्द्र सिंह विष्ट ने किया है। यहाँ से हल का प्रमाण तथा सबसे उत्तम कोटि के जौ का प्रमाण मिला है।

नोट: आजादी के बाद भारत में सबसे ज्यादा हड़प्पाई स्थलों का उत्खनन जो हुआ है, इसमें सबसे अधिक स्थान गुजरात से मिले हैं जैसे: धौलावीरा, रंगपुर इत्यादि।

7. धौलावीरा:
यह गुजरात में लूनी नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज जे. पी. जोशी और रवीन्द्र सिंह विष्ट ने किया है। हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत एकमात्र स्टेडियम का पता धौलावीरा से लगा है।

8. रंगपुर:
यह गुजरात प्रांत में भादर नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज रंगनाथ राव ने की है।

9. रोपड़:
स्वतंत्र भारत में उत्खनित प्रथम स्थल रोपड़ है जो पंजाब में सतलज नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज यज्ञदत्त शर्मा ने किया है।

10. आलमगीरपुर:
यह उत्तर-प्रदेश के हिंडन नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज यज्ञदत्त शर्मा ने किया है।

11. राखीगढ़ी:
यह हरियाणा में घग्घर नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज प्रो० सूरजभान ने किया है। भारत में स्थित सभी हड़प्पाई स्थलों में सबसे बड़ा यही है।

मुंडीगाक और सोरतुगई हड़प्पाई स्थल अफगानिस्तान में स्थित हैं।

12. कोटदीजी:
यह पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में सिन्धु नदी के तट पर स्थित है, इसकी खोज फजल अहमद खान ने किया है।

13. सुत्कागेंडोर:
यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है, इसकी खोज ऑरेल स्टीन ने किया है।

हड़प्पा काल

हड़प्पा काल को मुख्य रूप से तीन भागों में समझा जा सकता है: सामाजिक जीवन, आर्थिक जीवन और राजनीतिक जीवन।

(1) सामाजिक जीवन

हड़प्पाई स्थलों के उत्खनन से भारी मात्रा में स्त्री की मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि हड़प्पाई समाज मातृसत्तात्मक रहा होगा तथा समाज में महिला की स्थिति अच्छी रही होगी।

हड़प्पा काल में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन नहीं हुआ करता था लेकिन समाज में चार वर्ग के लोग रहा करते थे:

  • पुरोहित (विद्वान)
  • योद्धा
  • व्यापारी
  • श्रमिक

हड़प्पाकालीन लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन किया करते थे।

लोथल से मछली पकड़ने का यंत्र और कालीबंगा से पशुओं की हड्डी मिली है, जो इस बात की ओर इशारा करती है कि हड़प्पाकाल के लोग मांसाहारी भोजन भी किया करते थे।

हड़प्पाकाल के लोग मनोरंजन के लिए मछली पकड़ना करते थे, साथ ही साथ पासा भी खेला करते थे।

हड़प्पाकालीन लोग सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहना करते थे।

इस समय महिला और पुरुष साज-सज्जा पर खूब ध्यान दिया करते थे। हड़प्पा से ताँबा का दर्पण, काजल लगाने की सलाई और चन्हुदड़ो से लिपस्टिक का प्रमाण मिली है।

हड़प्पा काल में अंतिम संस्कार तीन प्रकार से होता था, जिसमें सबसे ज्यादा प्रचलित पूर्ण समाधिकरण था:

  • पूर्ण समाधिकरण
  • आंशिक समाधिकरण
  • दाह संस्कार

धार्मिक जीवन

हड़प्पा सभ्यता के लोग बहुदेववादी थे, ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इस सभ्यता के लोग पशु-पक्षी, नदी, झरना, पेड़-पौधा, सूर्य, पृथ्वी इत्यादि की पूजा किया करते थे।

कई हड़प्पा स्थलों से स्वास्तिक चिह्न के प्रमाण मिले हैं, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इस सभ्यता के लोग सूर्य की पूजा किया करते थे।

हड़प्पा काल में देवी और देवता दोनों की पूजा हुआ करती थी। इस काल के सबसे लोकप्रिय देवता आद्य शिव थे, जिन्हें भगवान शिव माना जाता है।

इस काल में शिव की पूजा दो रूपों में हुआ करती थी, जिसमें पहला शिव की मानव रूप की पूजा और दूसरा शिवलिंग की पूजा।

हड़प्पा काल में देवियों की भी पूजा होती थी। उत्खनन से भारी मात्रा में स्त्री की मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं।

हड़प्पाकालीन लोग यज्ञ प्रथा से भी परिचित थे। अग्निकुंड का प्रमाण कालीबंगा, लोथल और बनावली से मिलता है।

हड़प्पा सभ्यता के लोग ऐहलौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन में विश्वास करते थे।

आर्थिक जीवन

भारत में नगरीकरण का पहला साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता में देखने को मिला है।

कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योग हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख आधार थे।

कपास भारत का देशज पौधा है और इसका सर्वप्रथम उत्पादन सिन्धु घाटी सभ्यता में हुआ।

हड़प्पा सभ्यता के लोग गाय, भैंस, बैल, बकरी, हाथी, कुत्ता, बिल्ली इत्यादि पालते थे।

हड़प्पा सभ्यता के लोग मृदभांड, वस्त्र और धातु उद्योग से परिचित थे।

व्यापार

हड़प्पा सभ्यता का मुख्य व्यवसाय व्यापार था। इसका व्यापार मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से होता था।

मेसोपोटामिया में हड़प्पा सभ्यता को 'मेलुहा' कहा जाता था।

व्यापार वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित था।

राजनीतिक जीवन

हड़प्पाई स्थलों से किसी संगठित राजनीतिक व्यवस्था के प्रमाण नहीं मिले हैं। इतिहासकारों का मानना है कि शासन व्यापारी वर्ग के हाथों में रहा होगा।

व्हीलर के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का शासन मध्यवर्गीय जनतंत्रात्मक था।

हड़प्पाई लिपि

हड़प्पाई लिपि चित्रात्मक थी और दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। अभी तक इसे पढ़ा नहीं जा सका है।

हड़प्पा सभ्यता की देन

नगर नियोजन, जल निकासी, व्यापार, योग, दशमलव प्रणाली और मूर्ति पूजा हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख देन हैं।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण

अधिकांश विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ था।

अन्य कारणों में बाह्य आक्रमण और जलवायु परिवर्तन को भी माना गया है।

सार :-

सिन्धु घाटी सभ्यता भारत की प्रथम एवं प्राचीनतम नगरीय सभ्यता मानी जाती है, जिसका विकास सिन्धु नदी तथा उसकी सहायक नदियों के तट पर हुआ। यह सभ्यता भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी तथा कांस्ययुगीन सभ्यता के अंतर्गत आती है। उन्नत नगर नियोजन, सुदृढ़ जल निकासी व्यवस्था, ग्रिड पद्धति पर आधारित नगर, पक्की ईंटों के मकान और विकसित व्यापार प्रणाली इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।
हड़प्पा सभ्यता के लोग कृषि, पशुपालन, उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जुड़े हुए थे तथा मिस्र और मेसोपोटामिया से व्यापारिक संबंध रखते थे। धार्मिक रूप से ये लोग बहुदेववादी थे और आद्य शिव, मातृदेवी तथा प्रकृति की पूजा करते थे। हड़प्पाई लिपि चित्रात्मक थी, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है।
इस सभ्यता का पतन विभिन्न कारणों जैसे बाढ़, जलवायु परिवर्तन और बाह्य आक्रमण के कारण हुआ माना जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में पूर्ण विकसित नगरीय जीवन का प्रथम उदाहरण सिन्धु घाटी सभ्यता ही है।

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Q1. हड़प्पा सभ्यता किस युग से संबंधित है?

Q2. भारत में सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल कौन-सा है?

Q3. मोहनजोदड़ो किस नदी के तट पर स्थित है?

Q4. हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?

Q5. हड़प्पाई लिपि कैसी थी?

Q6. हड़प्पा सभ्यता के लोग किस धातु से परिचित नहीं थे?

Q7. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को जुड़वां राजधानी किसने कहा?

Q8. धौलावीरा किसके लिए प्रसिद्ध है?

Q9. हड़प्पा सभ्यता का मुख्य व्यवसाय क्या था?

Q10. लोथल किसके लिए प्रसिद्ध था?

Q11. हड़प्पा सभ्यता किस नदी के नाम पर है?

Q12. कालीबंगा किस नदी के तट पर स्थित है?

Q13. हड़प्पाई लिपि किस दिशा में लिखी जाती थी?

Q14. हड़प्पा सभ्यता का पतन किस कारण माना जाता है?

Q15. हड़प्पा सभ्यता किस काल में आती है?


 

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